जिले को कुपोषण मुक्त बनाने की हो रही पहल

&NewLine;<p><&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p><&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p><&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p><strong><mark style&equals;"color&colon;&num;cf2e2e" class&equals;"has-inline-color has-vivid-red-color">अररिया&comma; रंजीत ठाकुर।<&sol;mark><&sol;strong> कुपोषण जिले के प्रमुख स्वास्थ्य समस्याओं में से एक है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे यानी एनएफएचएस 05 के आंकडों के मुताबिक जिले में पांच साल से कम उम्र के 47&period;8 फीसदी बच्चे अल्पवजन के शिकार हैं। इसी आयु के 49&period;9 फीसदी बच्चों की लंबाई उम्र की तुलना में कम है। 23&period;9 फीसदी बच्चों की लंबाई की तुलना में वजन कम है। समय रहते समुचित ईलाज से बच्चों को कुपोषण की समस्या से निजात दिलाया जा सकता है। इसे लेकर जिला स्वास्थ्य विभाग व आईसीडीएस द्वारा संयुक्त रूप से कई जरूरी पहल की जा रही है।<&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p><strong>आंगनबाड़ी केंद्र के माध्यम से बच्चों के पोषण स्तर की हो रही जांच<&sol;strong><&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p>जिले को कुपोषण मुक्त बनाने के प्रयासों की मजबूती में आईसीडीएस की भूमिका महत्वपूर्ण है। जानकारी देते हुए आईसीडीएस डीपीओ मंजुला कुमारी व्यास ने बताया कि आंगनबाड़ी केंद्र के माध्यम से बच्चों के पोषण स्तर की जांच की जा रही है। संबंधित पोषक क्षेत्र के सभी बच्चों के लंबाई&comma; वजन सहित शारीरिक विकास की समुचित निगरानी की जाती है। बच्चो के स्वास्थ्य व पोषण संबंधित महत्वपूर्ण सूचकांकों में अपेक्षित सुधार लाने के उद्देश्य से जिले में संवर्धन &OpenCurlyQuote;कुपोषण के विरुद्ध व्यापक अभियान’ कार्यक्रम संचालित किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि अररिया नीति आयोग द्वारा चिह्नित आकांक्षी जिलों की सूची में शामिल है। जिले में अति कुपोषित बच्चों के समुदाय आधारित प्रबंधन कार्यक्रम यानि संवर्धन एक महत्वपूर्ण पहल है। इसके तहत सामुदायिक स्तर पर कुपोषित बच्चों के विशेष देखभाल के साथ बच्चों के पोषण स्तर में सुधार को लेकर विशेष पहल की जा रही है।<&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p><strong>विभिन्न स्तरों पर किया जा रहा लोगों को जागरूक<&sol;strong><&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p>जिला पोषण समन्वयक कुणाल कुमार श्रीवास्तव ने बताया कि संवर्धन कार्यक्रम के तहत सामुदायिक स्तर पर कुपोषण संबंधी मामलों को प्रबंधित किया जाना है। इसके तहत ऊर्जायुक्त भोजन&comma; माइक्रोन्यूटेंट सप्लिमेंट&comma; आवश्यकतानुसार जरूरी उपचार&comma; उचित व्यवहार के लिये जरूरी परामर्श व फॉलोअप सहित आशा व आंगनबाड़ी कार्यकर्ता द्वारा गृह आधारित देखभाल के माध्यम से कुपोषित बच्चों को सामान्य बच्चों की श्रेणी में लाने का प्रयास किया जा रहा है। समुदाय स्तर पर छह माह तक के बच्चों को स्तनपान व इससे अधिक उम्र के बच्चों को स्तनपान के साथ ऊपरी आहार का सेवन कराने के लिए प्रेरित व जागरूक किया जा रहा है।<&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p><strong>कुपोषित बच्चों के उपचार में एनआरसी की भूमिका महत्वपूर्ण<&sol;strong><&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p>कुपोषण के खिलाफ जारी लड़ाई में सदर अस्पताल परिसर में संचालित पोषण पुर्नवास केंद्र की भूमिका महत्वपूर्ण है। जागरूकता की कमी के कारण जिलावासी इसका समुचित लाभ नहीं ले पा रहे हैं। जानकारी के अभाव में अभिभावक अपने कुपोषित बच्चों को इलाज के लिये केंद्र नहीं पहुंच रहे हैं। एनआरसी में कुपोषित बच्चों के इलाज का समुचित इंतजाम उपलब्ध है। इतना ही नहीं इलाज के दौरान बच्चे के एक अभिभावक के रहने खाने की सुविधा भी नि&colon;शुल्क उपलब्ध उपलब्ध कराईं जाती है। साथ ही उन्हें श्रम क्षतिपूर्ति राशि के रूप में 100 प्रतिदिन के हिसाब से भुगतान किया जाता है। आशा द्वारा बच्चों को केंद्र इलाज के लिये लाने पर उन्हें 250 रुपये इंसेंटिव दिया जाता है।<&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p><strong>जन जागरूकता से कुपोषण को नियंत्रित करना संभव<&sol;strong><&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p>सिविल सर्जन डॉ विधानचंद्र सिंह ने कहा कि जन जागरूकता से कुपोषण संबंधी मामलों को बहुत हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। आमजनों को कुपोषण के कारण&comma; इसकी पहचान व इसके दुष्परिणाम से अवगत कराकर इससे बचाव संबंधी उपायों के प्रति जागरूक करने की जरूरत है। ताकि जिले को कुपोषण मुक्त बनाया जा सके। इसके लिए विभिन्न स्तरों पर सामूहिक प्रयास जरूरी है।<&sol;p>&NewLine;

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