एमडीए अभियान में कम्युनिटी रेडियो बना जमीनी ताकत

&NewLine;<p><&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p><strong>पटना&comma; &lpar;न्यूज़ क्राइम 24&rpar;<&sol;strong> फाइलेरिया उन्मूलन की दिशा में राज्य के 34 जिलों में 10 फरवरी से मास ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन &lpar;एमडीए&rpar; अभियान चलाया जा रहा है&comma; जिसमें घर-घर जाकर लोगों को फाइलेरिया रोधी दवाओं का सेवन कराया जा रहा है। कार्यक्रम की सफलता के लिए समुदाय का दवा सेवन के प्रति भरोसा एक महत्वपूर्ण कड़ी है। इस दिशा में कम्युनिटी रेडियो लोगों के भरोसे और भागीदारी का सबसे मजबूत माध्यम बनकर उभरा है। स्मार्ट संस्था के सहयोग से कम्युनिटी रेडियो स्टेशनों ने केवल जानकारी प्रसारित करने तक खुद को सीमित नहीं रखा&comma; बल्कि गांव-गांव जाकर संवाद&comma; सहभागिता और विश्वास के जरिए एमडीए को एक सरकारी कार्यक्रम से जन-आंदोलन में तब्दील करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा है। वहीं कम्युनिटी रेडियो ने एमडीए अभियान में लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न स्थानों जैसे विद्यालय&comma; महाविद्यालयों एवं विभिन्न गाँवों में कैंप आयोजित किए हैं। इस पहल से अधिक से अधिक लोगों को एमडीए एवं फाईलेरिया पर जागरूक करने में सफलता मिली है।<&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p><strong>जब अभियान बना समुदाय की पहल &colon;<&sol;strong><&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p>कई जिलों में कम्यूनिटी रेडियो ने पूर्व के एमडीए अभियान में अपनी सक्रिय भूमिका भी निभाई। जहां कहीं दवा को लेकर झिझक या आशंका दिखी&comma; वहां रेडियो कर्मियों ने खुद आगे आकर दवा खाई और समुदाय के साथ खड़े हुए। इससे यह संदेश गया कि एमडीए सुरक्षित है और सभी के लिए ज़रूरी है। रेडियो टीमों की सक्रिय भागीदारी से एमडीए शिविर और ग्राम बैठकों में लोगों की भागीदारी बढ़ी।<&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p><strong>स्टूडियो से निकलकर गांवों तक पहुंच<&sol;strong><&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p><br>कम्युनिटी रेडियो ने अपनी भूमिका को स्टूडियो तक सीमित नहीं रखा। हर स्टेशन ने लगभग 10 गांवों को चिन्हित कर 100 प्रतिशत कवरेज के लक्ष्य के साथ काम किया। डोर-टू-डोर संपर्क&comma; नैरो-कास्टिंग&comma; गांव की बैठकों और नाइट ब्लड सर्वे जैसे अभियानों में रेडियो टीमों ने सक्रिय सहयोग दिया। फाइलेरिया क्या है&comma; एमडीए क्यों ज़रूरी है और दवा से कोई नुकसान नहीं होता—इन सवालों का जवाब स्थानीय भाषा और उदाहरणों के जरिए दिया गया&comma; जिससे डर और अफवाहों पर प्रभावी रोक लगी।<&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p><strong>योजनाबद्ध और भरोसेमंद संवाद हुआ कारगर &colon;<&sol;strong><&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p>एमडीए को लेकर रेडियो पर प्रसारित कार्यक्रम सिर्फ सामान्य संदेश नहीं थे&comma; बल्कि स्वास्थ्य अधिकारियों के परामर्श से तैयार किए गए प्रभावी संदेश थे। फाइलेरिया विशेषज्ञों&comma; राज्य कार्यक्रम अधिकारियों और जिला मलेरिया अधिकारियों के इंटरव्यू से तकनीकी जानकारी को सरल भाषा में लोगों तक पहुंचाया गया। प्रधान&comma; कोटेदार&comma; आशा&comma; एमओआईसी&comma; सीएमओ&comma; डीसी और स्वयं फाइलेरिया मरीजों की आवाज़ ने कार्यक्रमों को और विश्वसनीय बनाया। सभी कंटेंट को साझा प्लेटफॉर्म और नियमित समन्वय के जरिए एकसार संदेश के रूप में आगे बढ़ाया गया।<&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p><strong>बेहतर समन्वय बना प्रभावी &colon;<&sol;strong><&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p>कम्युनिटी रेडियो ने आशा&comma; आंगनवाड़ी&comma; आईसीडीएस और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के साथ मिलकर काम किया। सवाल-जवाब आधारित कार्यक्रमों के जरिए दवाओं के साइड-इफेक्ट और मिथकों पर खुलकर चर्चा की गई। इससे रेडियो पर सुनी बात और ज़मीनी अनुभव के बीच का भरोसे का अंतर खत्म हुआ।<&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p><strong>कहानियों से बदली सोच &colon;<&sol;strong><&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p>एमडीए के दौरान रेडियो स्टेशनों ने उन लोगों की कहानियां रिकॉर्ड कीं&comma; जिन्होंने पहले दवा लेने से इनकार किया था लेकिन बाद में समझकर दवा ली। किसी ने जाना कि पैरों की सूजन फाइलेरिया से जुड़ी है&comma; तो किसी ने दवा खाने के बाद राहत महसूस की। इन कहानियों को रेडियो के साथ-साथ डिजिटल माध्यमों पर भी साझा किया गया&comma; जिससे संदेश और मजबूत हुआ। कम्युनिटी रेडियो ने यह साबित किया कि जब आवाज़ लोगों की हो&comma; तो सरकारी अभियान भी लोगों का अभियान बन जाता है।<&sol;p>&NewLine;

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