354वां प्रकाशपर्व : बाललीला गुरुद्वारा का पौराणिक इतिहास

<p><strong>पटनासिटी&lpar;न्यूज़ क्राइम 24 संवाददाता&rpar;&colon;<&sol;strong> 354वां प्रकाश पर्व के मौके पर पटना साहिब के बाल लीला गुरुद्वारा में आज विशेष आयोजन किया गया&comma; जहां श्रद्धालुओं को प्रसाद के रूप मे घुघनी पूरी खिलाया गया&period; सिक्खो के दसवे गुरु गोविन्द सिंह का जन्म पटना साहिब में पौषमाह &lpar;सर्दी के मौसम&rpar; में हुआ था&period; बताया जाता है कि बाल्य अवस्था में वे अपने दोस्तों के साथ पटना साहिब में स्थित फ़तेह चंद्र मैनी राजा के बगीचा में जाया करते थे और अपने दोस्तों के साथ खेलते थे साथ ही धुप का आनंद भी लेते थे&period;<&sol;p>&NewLine;<p><amp-youtube data-videoid&equals;"PyZiJkOH7tM" layout&equals;"responsive" width&equals;"1400" height&equals;"788"><&sol;amp-youtube><&sol;p>&NewLine;<p>वही रोजाना दातुन करते थे और उसकी डंठल को महल के परिसर में गाड़ दिया करते थे&period; उस दातुन का डंठल जो आज करौंदा के पेड़ के रूप में मौजुद है &comma; इस जगह को लोग बाललीला या मैनी संगत गुरुद्वारा के नाम से जानते है&period; इसका पौराणिक इतिहास रहा है कि राजा फ़तेह चंद्र मैनी का कोई संतान नहीं था और वे खास कर बाल्य रूप में खेलने आते गुरु गोविन्द सिंह से लगाव था और राजा की पत्नी विशंभरा देवी को इसी तरह का संतान पाने की इच्छा थी&comma; रानी के बिचार को गुरु गोविन्द सिंह महाराज जानते थे&period; इसलिए वे उनके गोद में बैठ कर पुत्र का आनंद देते थे&period; साथ ही रानी से चने का घुगनी मांग कर खाया करते थे&period; उस हवेली और बगीचा जो मैनी संगत बाल लीला गुरुद्वारा के नाम से प्रसिद्ध है&period; गुरु गोविन्द सिह महाराज का जन्म स्थलीय स्थान होने के कारण आज लोग देश -विदेशो से श्रद्धालु आते है और गुरु महाराज के चरणों में अपना मत्था टेक कर आशिर्बाद लेते है&period; गुरु की नगरी की ख्याति देश ही नहीं विदेशो में भी बढ़ी है और गुरु पर्व में भारी संख्या में श्रद्धालु गुरु के दरवार में पहुँचते है।<&sol;p>&NewLine;

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