टीबी जांच के दायरे में चार गुना वृद्धि, आधुनिक तकनीक के समन्वय से ‘क्षय मुक्त राज्य’ के सपने को मिली नई उड़ान

&NewLine;<p><&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<ul class&equals;"wp-block-list">&NewLine;<li>बिहार ने अपनी जांच क्षमता को 200 से बढ़ाकर 902 किया<&sol;li>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<li>&&num;8216&semi;निक्षय मित्र&&num;8217&semi; और &&num;8216&semi;टीबी मुक्त पंचायत&&num;8217&semi; के जरिए सही पोषण और सामाजिक संबल किया जा रहा सुनिश्चित<br>पटना। बिहार में स्वास्थ्य विभाग ने टीबी &lpar;क्षय रोग&rpar; जैसी गंभीर बीमारी के समूल नाश के लिए अपनी पूरी शक्ति झोंक दी है। पिछले कुछ वर्षों के आंकड़ों का विश्लेषण करें तो यह स्पष्ट होता है कि राज्य ने संदिग्ध मरीजों की खोज और उनकी जांच की गति में अभूतपूर्व तीव्रता दिखाई है। जहाँ पहले प्रति लाख जनसंख्या पर जांच की दर काफी कम थी&comma; वह अब 200 से बढ़कर 902 तक पहुँच चुकी है। यह सफलता दर्शाती है कि स्वास्थ्य विभाग की टीम अब सक्रिय रूप से घर-घर जाकर संभावित मरीजों की पहचान कर रही है&comma; ताकि संक्रमण की कड़ी को शुरुआती स्तर पर ही तोड़ा जा सके। इस महाअभियान में न केवल सरकारी मशीनरी&comma; बल्कि निजी स्वास्थ्य क्षेत्र ने भी कंधे से कंधा मिलाकर भागीदारी निभाई है&comma; जिससे मरीजों के पंजीकरण और उनके उपचार की निगरानी में व्यापक सुधार हुआ है। बिहार अब तकनीक&comma; पारदर्शिता और &&num;8216&semi;निक्षय मित्र&&num;8217&semi; जैसे सामुदायिक सहयोग के एक ऐसे त्रिकोण पर काम कर रहा है&comma; जहाँ हर मरीज को न केवल दवा&comma; बल्कि सही पोषण और सामाजिक संबल भी सुनिश्चित किया जा रहा है।<br><&sol;li>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<li>अत्याधुनिक तकनीक और जिला-वार उत्कृष्ट प्रदर्शन<br>टीबी के विरुद्ध इस लड़ाई में बिहार की सबसे बड़ी ताकत आधुनिक जांच प्रणाली बनी है। अब पुरानी और कम सटीक पद्धतियों को पीछे छोड़ते हुए राज्य के 64&percnt; मरीजों की जांच अत्याधुनिक &&num;8216&semi;नाट&&num;8217&semi; &lpar;एन ए ए टी&rpar; मशीनों के माध्यम से की जा रही है। इस तकनीकी मोर्चे पर शेखपुरा और अरवल जैसे जिलों ने पूरे राज्य के सामने एक मिसाल पेश की है&comma; जहाँ अब लगभग 100 प्रतिशत जांच इसी आधुनिक तकनीक से संपन्न हो रही है। वहीं&comma; संदिग्धों की सबसे अधिक खोज और जांच दर के मामले में सिवान जिला पूरे बिहार में अव्वल स्थान पर बना हुआ है। इन प्रयासों का सीधा परिणाम यह हुआ है कि राज्य में अब टीबी के ऐसे मामलों की पहचान भी आसान हो गई है&comma; जिन पर सामान्य दवाइयां बेअसर होती हैं।<&sol;li>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<li><br>&&num;8216&semi;टीबी मुक्त पंचायत&&num;8217&semi; से जमीनी स्तर पर प्रहार<br>राज्य सरकार ने अब इस लड़ाई को निर्णायक बनाने के लिए &&num;8216&semi;टीबी मुक्त पंचायत&&num;8217&semi; की अभिनव पहल शुरू की है। इस योजना के अंतर्गत पंचायतों को कुछ कड़े मानकों पर परखा जा रहा है&comma; जैसे प्रति हजार आबादी पर कम से कम 30 संदिग्धों की जांच और 85&percnt; से अधिक उपचार सफलता दर। जो पंचायतें इन मानकों को पूरा करेंगी&comma; उन्हें 24 मार्च को विशेष रूप से सम्मानित और प्रमाणित किया जाएगा।<br><&sol;li>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<li>निक्षय मित्र&colon; सामुदायिक जुड़ाव से पोषण का आधार<br>इस अभियान का एक सबसे मानवीय और प्रभावशाली पहलू &&num;8216&semi;निक्षय मित्र&&num;8217&semi; पहल है&comma; जो समाज के सक्षम लोगों को टीबी मरीजों के साथ जोड़ती है। वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए यह लक्ष्य निर्धारित किया गया है कि कम से कम 20&percnt; सहमति देने वाले मरीजों को निक्षय मित्रों के माध्यम से सीधा लाभ पहुँचाया जाए।<br>उपचार में उच्च सफलता दर और सीधा वित्तीय लाभ<br>बिहार में टीबी मरीजों के स्वस्थ होने की दर यानी &&num;8216&semi;उपचार सफलता दर&&num;8217&semi; में निरंतर बढ़ोत्तरी दर्ज की जा रही है&comma; जो अब 87&percnt; को पार कर गई है। वर्तमान में राज्य के 75&percnt; मरीजों के बैंक खाते इस पोर्टल से सफलतापूर्वक जोड़े जा चुके हैं। मुंगेर और कैमूर जैसे जिलों में यह आँकड़ा 87&percnt; तक पहुँच चुका है&comma; जो यह सुनिश्चित करता है कि सरकारी सहायता बिना किसी बिचौलिए के सीधे जरूरतमंद मरीज के खाते में पहुँच रही है।<&sol;li>&NewLine;<&sol;ul>&NewLine;

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