भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक सामा-चकेवा की धूम, गूंज रही सामा चकेवा की गीत

&NewLine;<p><&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p><strong>अररिया&comma; रंजीत ठाकुर<&sol;strong> भरगामा प्रखंड क्षेत्र में भाई-बहन की प्रेम का प्रतीक सामा-चकेवा का त्योहार धूमधाम से मनाया जा रहा है। हरेक घरों में सामा-चकेवा का गीत गूंज रहा है। प्रसिद्ध लोकपर्व सामा चकेवा को लेकर बहनों में काफी उत्साह देखा जा रहा है। शाम ढलते हीं बहनें अपनी सहेलियों के संग टोली में लोकगीत गाती हुईं घरों से निकलती हैं और डाला में सामा-चकेवा की प्रतिमा को सजाकर सार्वजनिक स्थान पर बैठकर गीत गाती हैं। सामा खेलते समय वे आपस में हंसी-मजाक भी करती हैं। प्रसिद्ध लोकपर्व सामा-चकेवा के बारे में सार्वजनिक दुर्गा मंदिर महथावा के पुजारी हरेराम झा बताते हैं कि सामा-चकेवा का उत्सव सीमांचल व मिथिलांचल की प्रसिद्ध संस्कृति और कला का एक अंग है। <&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p>यह कार्तिक शुक्ल पक्ष के सात दिन बाद शुरू होता है। इस पर्व के लिए बहने सामा-चकेवा की छोटी-छोटी मूर्तियां बनाती है&comma;जिनमें सामा चकेवा के अलावे हंसा&comma;टिहुली&comma; सतभैया&comma;भरिया&comma;भ्रमरा&comma;लड्डू&comma;बेचनी इत्यादि के साथ चुगला की मूर्ति भी बनाई जाती है इसके साथ हीं मिट्टी के छोटे-छोटे बर्तन में चूड़ा&comma;मूढी&comma;गुर और मिठाई आदि भी रखते हैं। बता दें कि कार्तिक पूर्णिमा को सभी बहनें सामा-चकेवा की मूर्तियों को जोते हुए खेत में बड़े हीं धूमधाम से विसर्जित करती हैं। इसका समापन 15 नवंबर को कार्तिक पूर्णिमा के दिन होगा।<&sol;p>&NewLine;

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