मां विंध्यवासिनी, इस शक्तिपीठ में ही आदिशक्ति के पूर्ण स्वरूप की होती है पूजा

&NewLine;<p><&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p><strong><mark style&equals;"color&colon;&num;cf2e2e" class&equals;"has-inline-color has-vivid-red-color">उत्तर प्रदेश&comma; न्यूज क्राइम 24। <&sol;mark><&sol;strong>का मिर्जापुर शक्‍त‍ि आराधना का प्रमुख स्‍थल है&period; इस ज‍िले में मां विंध्यवासिनी देवी का एक प्राचीन मंदिर स्थित है&period; विंध्य पर्वत पर स्थित इस मंदिर का वर्णन पुराणों में भी मिलता है&period; ऐसी मान्यता है यहां मां विंध्यवासिनी जागृत स्‍वरूप में व‍िराजती हैं&period; वहीं यह शक्‍ति‍ पीठ भारत के अन्‍य 51 शक्‍त‍ि पीठों शाम‍िल है&comma; लेक‍िन यह उनसे ब‍िलकुल अलग है&period; सि‍र्फ यहीं पर आद‍िशक्‍त‍ि के पूर्ण स्‍वरूप की पूजा होती है&period; मान्‍यता है क‍ि विंध्यवासिनी देवी के आशीर्वाद से ही इस सृष्टि का विस्तार हुआ है&period; मार्कंडेय पुराण के अनुसार विंध्यवासिनी देवी ने ही महिषासुर नाम के राक्षस का वध किया था&period; इसी वजह से आज भी शक्तिपीठ के रूप में यह मंदिर आस्था का एक बड़ा केंद्र है&period;<br><&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p>मंदिर को लेकर पौराणिक मान्यता मां विंध्यवासिनी देवी के इस मंदिर को लेकर पौराणिक मान्यता प्रचलित है&period; बताया जाता है कि राजा प्रजापति दक्ष की पुत्री सती के रूप में मां जगदंबिका ने जन्म लिया और फिर भगवान शिव से उनका विवाह भी हुआ&period; दक्ष ने एक विशाल यज्ञ किया&comma; जिसमें भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया और बाकी सभी देवताओं को उन्होंने बुलाया&period; देवी सती ने अपने पति भगवान शिव को न बुलाए जाने से नाराज होकर यज्ञ कुंड में कूदकर अपने प्राणों की आहुति दे दी&period; इसके बाद भगवान शिव नाराज हो कर तांडव करने लगे&period; <&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p>वहीं भगवान ब्रह्मा के आग्रह पर भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से शरीर की 51 टुकड़े कर दिए&period; यह टुकड़े जिस स्थान पर गिरे&comma; वह शक्तिपीठ बन गया&period; वहीं देवी के शक्तिपीठों में विंध्यवासिनी देवी भी शामिल हैं&period;मनु ने की थी मां की पूजा&comma;वहीं दूसरी मान्यता के अनुसार के ब्रह्मा जी ने सबसे पहले अपने मन से मनु और सतरूपा को उत्पन्न किया था&period; दोनों के विवाह के बाद मनु ने अपने हाथों से देवी की मूर्ति बनाकर 100 सालों तक तपस्या की फिर देवी ने खुश होकर उन्हें वंश वृद्धि और परम पद पाने का आशीर्वाद दिया&period; फिर देवी विंध्याचल पर्वत पर चली गईं तब से विंध्यवासिनी देवी की पूजा होने लगी&period;शिव पुराण में भी मिलता है जिक्र&comma; विंध्यवासिनी देवी के इस मंदिर का जिक्र शिव पुराण में भी मिलता है&period; <&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p>जिसमें बताया गया है कि आदि देवी पूर्ण रूप में स‍िर्फ एक जगह विराजमान हैं&period; वह विंध्याचल धाम हैं&period; जहां पर देवी के पूरे विग्रह रूप का दर्शन होते हैं&period;और शक्तिपीठों में देवी के अलग-अलग अंगों के प्रतीक के रूप में पूजा होती है&period; इसी के चलते इस मंदिर के बारे में कहा जाता है कि सच्चे मन से यहां श्रद्धालुओं की हर मनोकामना पूरी होती है&period; वहीं इस पीठ की एक और व‍िशेष बात यह है क‍ि यहां पर 3 क‍िलोमीटर के दायरे में तीनों प्रमुख देव‍ियों के मंद‍िर हैं<&sol;p>&NewLine;

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