आंसुओं से उम्मीद तक : एम्स पटना ने लौटाई बचपन की मुस्कान

&NewLine;<p><&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p><strong>पटना&comma; &lpar;न्यूज़ क्राइम 24<&sol;strong>&rpar; कभी कभी कुछ पल पूरे जीवन की दिशा बदल देते हैं। बिहार के वैशाली की छह वर्षीया लक्ष्मी कुमारी के लिए वह पल दोपहर करीब 2 बजे आया जब खेलते खेलते उसका दाहिना हाथ चारा काटने की मशीन में बुरी तरह कट गया। घर की खुशियाँ अचानक चीखों और आंसुओं में बदल गईं। परिवार उसे लेकर अस्पताल दर अस्पताल भटकता रहा। हर मिनट भारी था&comma; हर सेकंड उम्मीद और डर के बीच झूल रहा था। अंततः शाम करीब 7&colon;30 बजे लक्ष्मी को एम्स पटना के आपातकालीन विभाग में लाया गया और यहीं से शुरू हुई एक नई उम्मीद।<&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p>एम्स पहुंचते ही प्लास्टिक सर्जरी और एनेस्थीसिया की टीमें तुरंत सक्रिय हो गईं। आधे घंटे के भीतर लक्ष्मी ऑपरेशन थिएटर में थी। रात 8 बजे शुरू हुई सर्जरी किसी परीक्षा से कम नहीं थी। नन्हीं नसें&comma; महीन धमनियां&comma; कोमल टेंडन…हर संरचना को फिर से जीवन देना था।<&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p>लगभग छह घंटे तक डॉक्टरों की टीम बिना रुके जुटी रही। तड़के करीब 2 बजे जब सर्जरी पूरी हुई तो वह सिर्फ एक ऑपरेशन का अंत नहीं था&comma; वह उम्मीद की एक नई सुबह थी। यह प्रक्रिया प्लास्टिक सर्जरी विभागाध्यक्ष डॉ&period; वीणा सिंह के मार्गदर्शन में संपन्न हुई। टीम में डॉ&period; अंसारुल&comma; डॉ&period; कुलदीप&comma; डॉ&period; मैरी&comma; डॉ&period; अजीना&comma; डॉ&period; निकिता और डॉ&period; अनुप शामिल थे जिन्हें एनेस्थीसिया&comma; ऑपरेशन थिएटर और नर्सिंग टीम का पूर्ण सहयोग मिला।<&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p>सोमवार को ऑपरेशन का तीसरा दिन था। लक्ष्मी की उंगलियों में रक्त संचार के सकारात्मक संकेत दिख रहे हैं। डॉक्टरों को विश्वास है कि सही देखभाल और पुनर्वास के साथ वह अगले 1-2 महीनों में फिर से अपने हाथ से खिलौने थाम सकेगी&comma; रंग भर सकेगी और ताली बजा सकेगी। यदि सब कुछ इसी तरह ठीक रहा तो एक सप्ताह के भीतर उसे अस्पताल से छुट्टी मिल सकती है।<&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p><strong>कटे हुए अंग के सुरक्षित परिवहन के लिए जरूरी सावधानियां-<&sol;strong><&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p>कटे हुए अंग को साफ प्लास्टिक बैग में रखें।<br &sol;>उस बैग को बर्फ के टुकड़ों वाले दूसरे बैग में रखें।<br &sol;>अंग को बर्फ के सीधे संपर्क में न आने दें।<br &sol;>अंग को पानी या किसी अन्य तरल में न डालें।<&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p>यह सफलता केवल चिकित्सा कौशल की नहीं बल्कि संवेदनशीलता&comma; टीमवर्क और समर्पण की कहानी है जिनके संयुक्त प्रयास ने एक मासूम का हाथ ही नहीं&comma; उसका बचपन&comma; उसके सपने और उसके भविष्य को फिर से थाम लिया। सच ही कहा गया है कि जब विज्ञान के साथ करुणा जुड़ती है तो चमत्कार सच हो जाते हैं।<&sol;p>&NewLine;

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