47 साल बाद भी जमीन पर नहीं उतरा कोर्ट का फैसला, तीसरी पीढ़ी न्याय के लिए दर-दर भटक रही

&NewLine;<p><&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p><strong>फुलवारीशरीफ&comma; अजित।<&sol;strong> बिहार में न्यायालय के फैसलों के प्रशासनिक अनुपालन को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। वैशाली जिले के सहदेई बुजुर्ग अंचल से जुड़ा एक मामला सामने आया है&comma; जहां वर्ष 1978 में मुसिफ कोर्ट हाजीपुर से आया फैसला 47 वर्षों बाद भी जमीन पर लागू नहीं हो सका है।<&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p>मामला खाता संख्या 1706&comma; प्लॉट संख्या 5401 से जुड़ा है&comma; जिसकी कुल रकबा 31 डिसमिल बताई जा रही है&period;<br &sol;>दस्तावेजों के अनुसार वर्ष 1930 में यह जमीन चमरू महतो से दो भाइयों मुंशी साह और लक्खन साह द्वारा खरीदी गई थी। बाद में सर्वे के दौरान कथित त्रुटि के कारण पूरी जमीन बिहार सरकार के नाम दर्ज कर दी गई। इसके खिलाफ दायर मुकदमे में 19 जनवरी 1978 को मुंशिफ II एडिशनल कोर्ट&comma; हाजीपुर ने फैसला रैयतों के पक्ष में सुनाया। इसके बाद 30 जुलाई 1980 को चकबंदी पदाधिकारी&comma; हाजीपुर ने भी उसी निर्णय की पुष्टि की। मामले में महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि दोनों पाटीदारों की स्थिति आज समान नहीं है। सूत्रों के अनुसार लक्खन साह के वंशजों ने बाद के वर्षों में अपनी हिस्से की जमीन बेच दी। आरोप है कि इस प्रक्रिया में संबंधित अधिकारियों के समक्ष आवश्यक औपचारिकताएं पूरी कर रजिस्टर-2 में नाम चढ़वा लिया गया।<&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p>कहा जा रहा है कि उस पक्ष ने प्रशासनिक दबाव और कथित भ्रष्ट तंत्र के सामने घुटने टेक दिए&comma; जिसके बाद उनका काम आसानी से हो गया&period; वहीं दूसरी ओर स्व मुंशी साह के वंशजों की हिस्सेदारी आज भी विवाद में फंसी हुई है। उनका आरोप है कि न्यायालय&comma; चकबंदी और एडीएम &lpar;राजस्व&rpar; के स्पष्ट आदेश के बावजूद अंचल कार्यालय स्तर पर जानबूझकर फाइल रोकी जा रही है। परिवार का कहना है कि बिना अवैध लेन-देन के उनका मामला आगे नहीं बढ़ाया जा रहा। भारतीय लोकहित पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रेमनाथ प्रसाद ने आरोप लगाया है कि सहदेई बुजुर्ग अंचल में पदस्थापित वर्तमान एवं पूर्व अंचलाधिकारी न्यायालय के आदेशों का पालन नहीं कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि इस मामले की शिकायत प्रधानमंत्री भारत सरकार&comma; मुख्यमंत्री बिहार&comma; राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री&comma;जिला पदाधिकारी वैशाली&comma; एडीएम &lpar;राजस्व&rpar;&comma; अनुमंडलाधिकारी महनार और लोक शिकायत निवारण पदाधिकारी तक की जा चुकी है।<&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p>प्रख्यात शिक्षाविद सह पर्यावरण विद गुरुदेव श्री प्रेम उर्फ प्रेमनाथ प्रसाद का कहना है कि न्यायालय का फैसला मौजूद है&comma; लेकिन उसे जमीन पर लागू नहीं किया गया है। यह न सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही बल्कि न्यायालय की अवहेलना का भी गंभीर मामला है। मामले को लेकर भारतीय लोकहित पार्टी द्वारा &OpenCurlyDoubleQuote;स्याही सत्याग्रह” शुरू किया गया है। पीड़ित परिवार का कहना है कि जब तक अदालत का फैसला पूरी तरह लागू नहीं होता&comma; तब तक उनका संघर्ष जारी रहेगा।<&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p>यह मामला बिहार में भूमि सुधार और राजस्व प्रशासन की कार्यप्रणाली पर बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। सवाल यह है कि जब एक ही फैसले के आधार पर एक पाटीदार का काम हो सकता है&comma; तो दूसरे को 47 वर्षों तक क्यों भटकना पड़ रहा है। भारतीय लोकहित पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रेमनाथ प्रसाद उर्फ गुरुदेव श्री प्रेम&comma; जो प्रख्यात शिक्षाविद् एवं पर्यावरणविद् के रूप में भी जाने जाते हैं&comma; ने इस मामले को लेकर केंद्र और राज्य सरकार से सीधा हस्तक्षेप करने की मांग की है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी&comma; मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और बिहार सरकार के राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री को पत्र लिखकर कहा है कि न्यायालय के स्पष्ट फैसले के बावजूद एक परिवार को दशकों तक भटकना पड़ना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।<&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p>प्रेमनाथ प्रसाद ने सवाल उठाया कि जब अदालत का फैसला 1978 में आ चुका है&comma; तो उसे जमीन पर लागू करने में 47 वर्ष क्यों लग गए। उन्होंने कहा कि एक ही मामले में एक पाटीदार का काम हो जाना और दूसरे पाटीदार को पीढ़ी-दर-पीढ़ी न्याय के लिए भटकना पड़ना प्रशासनिक भ्रष्टाचार की ओर सीधा इशारा करता है। उन्होंने यह भी पूछा कि आखिर कितनी पीढ़ियों को न्याय पाने के लिए अंचल&comma; अनुमंडल और जिला कार्यालयों के चक्कर काटने पड़ेंगे। प्रेमनाथ प्रसाद ने मांग की कि पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए और दोषी अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई हो। उन्होंने कहा कि यदि समय रहते न्यायालय के आदेश का अनुपालन नहीं कराया गया&comma; तो यह न केवल एक परिवार बल्कि पूरे न्यायिक व्यवस्था के प्रति आम जनता के विश्वास को कमजोर करेगा।<&sol;p>&NewLine;

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